Major varieties of cumin, sowing method, seed treatment, amount of manure and fertilizer, weed control, irrigation, prevention of pests and diseases etc.
जीरे की प्रमुख किस्में (Major varieties of cumin)👇
जीरे में सरकारी किस्म GC-4
जो उकठा रोग को सहन कर सकती है| यह 110
दिन में तैयार हो जाती है| इसका बीज
सरकारी संस्था, कृषि विश्वीध्यालय या KVK
से
लेना चाहिए| अगली किस्में प्राइवेट कंपनीयों
की है जिसमें पहली है दिनकर सीड्स की पोखराज जो 10-12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज
दे देती है और उकठा रोग भी कम लगता है| दूसरी
किस्म है अवनी सीड्स की अवनी-111 और अवनी 121 जिनकी उपज 8-12 क्विंटल तक रहती है|
ये
भी उकठा के प्रति सहनशील किस्में है| अगली है
वेस्टर्न एग्री सीड्स की सी-60 जिसकी उपज 10-12 क्विंटल है| अंतिम किस्म है- अक्षय सीड टेक की तुलसी किस्म जिसमें झुलसा और उकठा रोग कम लगता है जो
105-110 दिन में पककर तैयार हो जाती है|
जीरे की बुवाई विधि
(Seed sowing in Cumin)
जीरे की बुवाई मध्य नवम्बर
के आसपास कर देनी चाहिए| तैयार
खेत में पहले क्यारी बनाते है उनमें बीजों को एक साथ छिटक कर क्यारियों में लोहे
की दँताली इस प्रकार फेरा देनी चाहिए कि बीज के ऊपर मिट्टी के एक हल्की परत चढ़
जाये| सीडड्रिल से भी 30 सेमी की दूरी
पर कतारों में बुवाई की जा सकती है| पौधे से
पौधे की दूरी 5 सेमी तक रखे| बुवाई 1
सेमी
से अधिक गहरी नहीं करें| बीजदर
की बात करें तो छिटकवा विधि से 12-15 किलो और लाइनों में बुवाई करने पर 8-10 किलो
बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता पड़ती है|
जीरे में सिंचाई कब कब करें (Time & interval of Cumin irrigation)👇
जीरे में क्यारी या फंवारा
विधि से पहली सिंचाई बुवाई के समय कर देनी चाहिए ध्यान रहे क्यारियों में पानी का
बहाव तेज ना हो| नहीं तो बीज बह कर एक जगह इक्कठा
हो जाएगा| दूसरी सिंचाई बुवाई के 10 दिन पर
कर देनी चाहिए जब बीज फूलने लगे| इस बीच
जमीन को हल्का नम रखे ताकि पपड़ी ना जमे और अंकुरण अच्छे से हो जाए|
अगली सिंचाई बुवाई के 30, 55 और
80 दिनों पर करनी चाहिए| फंवारा
3 घंटे ही चलाये| दाने बनते समय अंतिम सिंचाई गहरी
करनी चाहिए ताकि अधिक उत्पादन मिल सके|
जीरे में खरपतवार प्रबंधन (Weed management of Cumin crop)
जीरे की फसल में खरपतवार को उगने से रोकने के लिए जीरे की बुवाई के बाद और उगने से पहले पेंडिमेथालीन 38.7% CS 700 मिली या पेंदीमेथलीन 30 EC 1 लीटर को एक एकड़ क्षेत्र में 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करे| पेंडिमेथालीन का असर लम्बे समय तक रहता है जिससे अगली फसल के अंकुरण पर विपरीत असर पड़ता है| ऐसी स्थिति से बचने के लिए मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें| पौधे उगते ही यानि बुवाई के 15-20 दिन पर OXADIARGYL 6% EC 200 ml या ऑक्सीफ्लोरफेन OXYFLUORFEN 23.5 EC 50 ml प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें| इसके इस्तेमाल से खरपतवार नष्ट होने के साथ जीरे की फसल को हल्का झटका लगता है लेकिन बाद में फसल नॉर्मल हो जाएगी|
जीरे में बीजोंपचार (Seed treatment of Cumin crop)
घर के बीज उपयोग करने पर बीजों को कार्बेण्डजीम 50% WP या थायोफिनेट 70 WP से 2 ग्राम प्रति किलो बीज या जैविक फफूंदनाशी ट्राइकोडर्मा विरिडी से 10 ग्राम प्रति एक किलो बीज की दर से बीज उपचारित करना चाहिए|और बाद में एजोटोबेक्टर जीवाणु कल्चर और पीएसबी कल्चर 5 ग्राम प्रति एक किलो बीजों को उपचरित कर छाया में सुखाकर बोये ताकि फसल को नाइट्रोजन और फास्फोरस तत्व भी मिल जाये|
जीरे की फसल में खाद और उर्वरक (Manure & Fertilizer dose in Cumin crop)
वैसे तो खेत में खाद और fertilizer की dose सॉइल टेस्टिंग करा कर ही देनी चाहिए लेकिन मिट्टी जांच नहीं होने की स्थिति में जीरे की फसल में बुवाई से पहले 5 टन गोबर की सड़ी हुई खाद अच्छी तरह से खेत में मिला देनी चाहिए| आखरी जुताई के समय 65 किलो डीएपी और 9 किलो यूरिया खेत में देना चाहिए| बुवाई के समय 20 किलो सल्फर भी प्रति हेक्टेयर की दर से डालना चाहिए| उसके बाद 30-35 दिन पर सिंचाई के साथ 33 किलो यूरिया एक हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव कर देना चाहिए|
जीरे में
कीट और रोग (Insect & Disease in Cumin crop)
जीरे में कई प्रकार के रोग
व कीट लगते है, जिनमे है- माहु कीट,
उकठा रोग, झुलसा रोग,
छाछिया रोग
जीरे में
एफिड या माहु कीट का प्रकोप (Aphid attack in Cumin crop)
यह हरे पीले रंग का
अंडाकार कोमल कीट है जिसका आक्रमण फूल आने पर यानी जनवरी के पहले सप्ताह से शुरू
हो जाता है और फरवरी के अन्त से मध्य मार्च तक प्रकोप बहुत अधिक हो जाता है| यह पौधे से रस चूसकर उसको कमजोर और उपज कम करता
है| कीट को नियंत्रण करने के लिए Imidacloprid 17.8 SL 12 gram या Acephate 75 SP 20 gram या
Thiamethoxam 25 WG 8 ग्राम प्रति 15
लीटर पानी की टंकी में मिलाकर स्प्रे कर दे|
जरूरत पड़ने पर 10-15 दिन बाद स्प्रे दोहरा दे|
जीरे में
उकठा या विल्ट रोग (Wilt disease in Cumin crop)
इस रोग का प्रकोप फसल की किसी भी अवस्था में हो सकता है| लेकिन
शुरुआती अवस्था में जब पौधे छोटे ही होते है,
तब प्रकोप अधिक देखा गया है| इसमें
पौधे हरे ही मुरझाने लगते है| रोग
ग्रस्त पौधे की जड़ों को चीर कर देखा जाये तो उसमें लम्बी काले रंग की धारियाँ
दिखाई देती है| इस रोग की शुरुआत,
खेत में छोटे छोटे टुकड़ों से होती है उसके बाद रोग आगे चलकर पूरे खेत को अपनी चपेट
में ले लेता है|
रोग से बचाव के लिए गर्मी
में खेत की गहरी जुताई करे ताकि हानिकारक रोगाणुओं को नष्ट किया जा सके|
कम से कम 3 वर्ष तक जीरा-ग्वार-गेहूं-सरसों का फसल चक्र अपनाना चाहिए|
बुवाई से पहले सरसों का भूसा जमीन में मिलाने से रोग में कमी आती है|
बीजों को कार्बेण्डजीम 50% WP या थायोफिनेट
70 WP से 2 ग्राम
प्रति किलो बीज या जैविक फफूंदनाशी ट्राइकोडर्मा विरिडी से 10 ग्राम प्रति किलो
बीज की दर से बीज उपचारित करना चाहिए| बुवाई से पहले एक
किलो जैविक फफूंदनाशी ट्राइकोडर्मा विरिड को एक एकड़ खेत में 100 किलो गोबर की खाद
में मिलाने के बाद उसे फिर खेत में मिला दे और तुरन्त बाद हल्की सिंचाई जरूर करे|
जीरे में झुलसा/रातिया/ कालिया रोग (Blight disease in Cumin)
जीरे
की फसल में फूल लगने के बाद यदि आकाश में बादल छाये रहे तो इस रोग का लगना तय है| फूल आने के बाद से फसल पकने तक, यह रोग कभी भी हो सकता है| इस रोग से पौधे की
पत्तियाँ और तने पर शुरू में गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते है जो धीरे-धीरे काले हो
जाते है| पौधे झुलसे हुए नजर आते है और किनारे मूड जाते है| यह रोग नमी में अधिक फैलता है इसलिए जीरे की फसल में अधिक सिंचाई न करें.
बुवाई के 30-35 दिन बाद काबेण्डजिम 12+ मेंकोजेब 63 WP की 2
ग्राम या थायोफ़ेनेट मिथाइल 70 WP की 2 ग्राम
या कॉपर ओक्सीक्लोराइड 50 WP 2.5 ग्राम या क्लोरोथलोनिल 75%
WP की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें| जरूरत पड़ने पर 10-15 दिन बाद स्प्रे दोहरा भी देना चाहिए
जीरे में छाछिया/ भभूतिया/ चूर्णिल आसिता रोग (Powdery mildew in Cumin crop)
इस
रोग के लक्षण सबसे पहले निचली पत्तियों पर छोटे छोटे सफ़ेद धब्बे के रूप में दिखाई
देते है| जो पूरी पत्तियों पर फैल जाते है| है| धीरे धीरे पूरा पौधा ही सफ़ेद हो जाता है| मानों जीरे के खेत में आटा बिखेर दिया हो| यह रोग
फूल आने से बीज बनने तक अधिक उग्र दिखाई देता है| गर्म और
नमी वाले मौसम में अधिक तेजी से फैलता है|
जीरे
में रोग लक्षण दिखाई देते ही घुलनशील सल्फर 80 WDG 2.5
किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव कर दे| या ZINEB 68 +
HEXACONAZOLE 4 WP 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के साथ स्प्रे करें|
जीरे में छाछिया और झुलसा रोग एक साथ आने पर बचाव के उपाय (Control of Blight and Powdery mildew disease come together in cumin crop)👇
छाछिया
और झुलसा रोग एक साथ आने पर नियंत्रण के लिए ZINEB 68 + HEXACONAZOLE 4 WP 2 ग्राम
या METIRAM 55 + PYRACLOSTROBIN 5 WG
3.5 ग्राम या Epoxiconazole 5 + Pyraclostrobin 13.3 SE 1.5 ml प्रति लीटर पानी के हिसाब मिलाकर स्प्रे कर दे|
जीरे की फसल में कीट और बीमारियों से बचाने का स्प्रे सेडुयल (Spray Schedule to protect against pests and diseases in cumin crop)👇
जिनका
समय पर स्प्रे करने से बीमारियों व कीटों को आने से रोका जा सकता है -
पहला छिड़काव जीरे की बुवाई
के 30-35 दिन बाद मेंकोजेब 75 WP 2 ग्राम प्रति लीटर घोल बनाकर स्प्रे करें
| दूसरा छिड़काव बुवाई के 45-50 दिन बाद ZINEB 68 + HEXACONAZOLE 4 WP 2 ग्राम
या METIRAM 55 + PYRACLOSTROBIN 5 WG
को 3.5 ग्राम या Epoxiconazole 5 + Pyraclostrobin 13.3 SE 1.5 ml प्रति लीटर और इसके साथ डाइमेथोइट 30 EC 1 ml प्रति लीटर पानी के हिसाब से कीटनाशी मिलाकर स्प्रे कर दे|
तीसरा स्प्रे भी इन्ही रसायनों का दूसरे स्प्रे के 10—12 दिन बाद कर दे| यदि आवश्यक हो तो तीसरे छिड़काव के 10-15 दिन बाद 25 किलो
सल्फर पाउडर प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव कर दे|
जीरे में पकाव और उपज (Maturity and Yield of Cumin crop)👇
फसल 120-125 दिनों में पककर तैयार हो जाती है|
जिसकी उपज 6-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर आ जाती है|
आपका कोई भी सुझाव या जानकारी सहृदय आमंत्रित है| कमेन्ट करके जरूर बताए ....धन्यवाद🙏