बेर में कई प्रकार के रोग लगते है, जिन्हे सही समय पर पहचान कर treatment किया जा सकता है| नहीं तो उपज पर तो भारी असर पड़ता ही है, साथ ही plant के नष्ट होने के chance कई गुना बढ़ जाते है| इसमें पहला रोग है
छाछया या चूर्णील आसिता (Powdery mildew disease)
इस रोग का प्रकोप बरसात के बाद सर्दियों या जाड़ों के शुरू होने पर होता है| यानि यह अक्टूबर-नवम्बर महीने में दिखाई पड़ता है। इस रोग से बेर की पत्तियों, टहनियों और फूलों पर सफेद पाउडर जैसा दिखाई देता है| और effected part की बढ़वार रूक सी जाती है| इसके साथ ही फल व पत्तियाँ भी गिर जाती हैं। क्योंकि इससे सफेद चादर पत्तियों पर जाम जाती है अतः पेड़ प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) नहीं कर पता यानि पत्तियां भोजन नहीं बना पाती, क्योंकि पत्तियों को पूरी तरह से धूप नहीं मिल पाती|
छाछया रोग से बचाव व रोकथाम के उपाय (Preventive measures of Powdery mildew)
सबसे सस्ता उपचार घुलनशील गंधक का उपयोग कर सकते है, जिसके लिए 2 ग्राम Sulphur 80 WDG प्रतिलीटर पानी में मिलाकर छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर 2 से 3 बार कर देना चाहिए ताकि पेड़ पूरी तरह से सुरक्षित हो सके| इसके अलावा भी कई pesticide काम कर सकते है, जिसमें प्रमुख है CARBENDAZIM 50 WP, AZOXYSTROBIN 23 SC, Flusilazole 40 EC, HEXACONAZOLE 5 SC, THIOPHANATE METHYL 70 WP, DIFENOCONAZOLE 25 EC, Myclobutanil 10 WP, Tebuconazole 25.9 EC| इन सभी chemical की निश्चित मात्रा के प्रयोग से इस रोग की रोकथाम आसानी से की जा सकती है|
जड़ गलन रोग (Root rot disease)
यह रोग अधिक पानी देने पर हो जाता है, इसके साथ ही अधिक गर्मी बढ़ने पर fungus की growth भी बढ़ने लगती है| पौधे सूख जाते है और मर जाते है|
जड़ गलन रोग का उपचार (Preventive measures of Root rot disease)
रोकथाम के लिए CARBENDAZIM 50 WP या CHLOROTHALONIL 75 WP या मेटालेक्सल 8 + मेंकोजेब 64 WP की 2.5 से 3 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर जड़ों के पास डेंचिंग करनी चाहिए यानि पिला देना चाहिए|
कजली फफूंद/ सूटीमोल्ड (Sooty mold disease)
इस रोग के लक्षण अक्टूबर में दिखाई देने लगते है| यह फफूंद ग्रसित पत्तियों के नीचे की सतह पर काले धब्बे के रूप में दिखते है और बाद में पूरी तरह से सतह पर कालिख की तरह फैल जाते है|
कजली फफूंद/ सूटीमोल्ड का उपचार (Preventive measures of sooty mold disease)
रोग की रोकथाम या नियंत्रण के लिए रोग के लक्षण दिखाई देते ही मैन्कोजेब 3 ग्राम या 3 ग्राम कापर आक्सीक्लोराइड 50 WP दवा को प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए और जरूरत पड़ने पर 15 दिन के अंतर पर छिड़काव भी कर लेना चाहिए|
पत्ती धब्बा रोग (Leaf spot disease)
इस रोग के लक्षण नवम्बर में शुरू होते है| यह आल्टरनेरिया नाम की फॅफूद से होता है। प्रभावित पत्तियों पर छोटे-छोटे भूरे रंग के धब्बे बनते है और तथा बाद में धब्बे गहरे भूरे रंग के हो जाते है साथ ही पूरी पत्ती पर फैल जाते है। अंत में पत्तियाँ सूख कर गिर जाती है।
पत्ती धब्बा रोग का उपचार (Preventive measures of Leaf spot disease)
लक्षण दिखाई देते ही 3 ग्राम मेन्कोजेब 75 WP या 2 ग्राम थायोफिनेट मिथाइल 70 WP फफूँदनाशी को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करे और 15 दिन बाद स्प्रे दोहराए| तो हमने जाना बेर में लगने वाले रोग और इसका निदान
आप का कोई भी सुझाव या जानकारी सह्रदय आमंत्रित है, comment करके जरूर बताए धन्यवाद 🙏
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