मटर की खेती के सम्पूर्ण पहलू

Improved cultivation steps in Pea Crop  

रबी के मौसम में मटर एक महत्वपूर्ण सब्जी फसल है, जिसके लिए जाड़े वाली जलवायु उपयुक्त रहती है किन्तु पाला पड़ने पर फूल व फली को बहुत अधिक नुकसान पहुँचता है| क्योंकि मटर की फसल पाला पड़ने पर अतिसंवेदनशील होती है| इसकी बुवाई15 अक्टूबर से 15 नवंबर तक कर देनी चाहिए| हम यहाँ जानेगे मटर की फसल में अधिक उत्पादन की मुख्य तकनीकों के बारें में ...जिनमें होंगी उन्नत किस्में, बीज उपचार विधि, खाद एवं उर्वरक की मात्रा, खरपतवार नियंत्रण, सिंचाई, कीट एवं बीमारियों की रोकथाम इत्यादी के बारे में| 

मटर की उन्नत किस्में (Improved varieties of Pea)

अगेती यानि पहले बुवाई करने के लिए VL-3, अर्किल, जवाहर मटर 4,मटर अगेती-6 किस्में है। इनमें फलियां 50 से 60 दिन में आ जाती है| और समय पर बुवाई करने के लिए बोनविला, जवाहर मटर-1 (GC-141), पंजाब- 89, आजाद P-1, आजाद P-3, JP- 83 आदि मटर की किस्मे है, जिसकी फलियां 75 से 90 दिन में बेचने लायक हो जाती है|

मटर में बीज उपचार (Seed treatment in Pea)

मटर एक दलहनी फसल है, अतः इनकी जड़ों में कुछ गाँठे बन जाती है जिससे हवा में उपस्थित नाइट्रोजन पौधा ले पाता है| लेकिन ये राइजोबियम की गाँठे शुरुआती अवस्था में नहीं बनती है| इसलिए इसके बीज को राइजोबियम कल्चर से बीज उपचार करना चाहिए, जिससे कल्चर में उपस्थित beneficial bacteria पौधे की जड़ों की गांठों को अच्छी विकसित कर सके| बीज उपचार करने के लिए 300 ग्राम गुड को 1 लीटर पानी में मिलाकर घोल बना लें| गर्म पानी में मिलाने से गुड अच्छी तरह तैयार से घुल जाता है| घोल ठंडा होने पर तीन पैकेट यानि 600 ग्राम राइजोबियम कल्चर मिलाकर बीज को इस गाढ़े घोल में अच्छी तरह से मिला दे और बीज को छाया में सुखाने के बाद बुवाई कर देनी चाहिए| यह मात्रा 1 हेक्टेयर यानि 2.5 एकड़ खेत के लिए पर्याप्त है| या फफूँदनाशी रोग से बचाने के लिए रासायनिक माध्यम से 200 ग्राम कार्बेण्डजीम 12% + मेंकोजेब 75% WP की  या कार्बोक्सिन 37.5% + थिरम 37.5% DS की 250 ग्राम मात्रा प्रति 100 किलो बीज में मिलाकर भी बीज उचारित किया जा सकता है|

मटर में खाद एवं उर्वरक (Manure & Fertilizer in Pea)

खेती की तैयारी करते समय 200-250 क्विंटल अर्थात 20-25 टन गोबर की खाद प्रति एकड़ हेक्टेयर की दर से खेत में मिला कर जुताई कर दे| सीड कम फर्टिलाइजर ड्रील द्वारा प्रति हेक्टेयर 40 किलो फास्फेट, 25 किलो नत्रजन तथा 50 किलो पोटाश की मात्रा खेत में डाल दे|

मटर बीज की मात्रा और बुवाई (Seed rate & Sowing of Pea)

मटर की बुवाई के लिए 80 से 100 किलो यानि 32 से  40 प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त होता है| कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर और  पौधे से पौधे की दूरी 8 से 10 cm रखें| जमीन में नमी अधिक हो तो गहरी बुवाई ना करें|

मटर में निराई गुड़ाई और सिंचाई (Weeding & Irrigation)

बुवाई के लगभग 1 माह बाद निराई गुड़ाई कर लेनी चाहिए करना आवश्यक है| वैसे खरपतवारनाशी से खरपतवार को उगने से पहले बुवाई के 3 दिनों के बाद पेंडिमेथालीन 38.7% CS खरपतवारनाशी को 700 मिली प्रति एकड़ के हिसाब से 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव कर देना चाहिए ताकि फसल में दोनों प्रकार के संकरी और चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार को उगने से पहले रोका जा सके|  
पहली सिंचाई बुवाई के 4-5 सप्ताह बाद एवं दूसरी सिंचाई 7 से 8 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार करना चाहिए।

मटर में कीट एवं बीमारियों की रोकथाम (Prevention of Insects & Diseases in Pea)

मटर में कई प्रकार के कीट व रोग लगते है, जैसे 

तना मक्खी एवं लीफ माइनर (Stem borer & Leaf minor)

तना मक्खी के attack के कारण टहनी का अगला भाग मर जाता है एवं बढ़ोतरी बंद हो जाती है| इस मक्खी का प्रकोप पौधे के उगने के 15 से 20 दिन बाद शुरू होता है| दूसरा है- लीफ माइनर कीट जो मटर के पत्तों के अंदर सुराख कर देता हैं| इनका प्रकोप फसल के किसी बगी अवस्था में हो सकता है|
इन दोनों की रोकथाम हेतु क्यूनोल्फोस 25 EC 300 मिली प्रति 200 लीटर पानी के हिसाब से मिलाकर छिड़काव कर दे|

फली छेदक (Pod borer)  

ये हरे रंग की लट होती है, जो बाद में गहरे भूरे रंग में बदल जाती है| यह फूल आने के समय से फल की कटाई तक किसी भी अवस्था में फसल को नुकसान पहुंचा सकती है| लटें फली में छेद से दना नष्ट कर देती है।   
रोकथाम के लिए फूल आने से पहले और फली लगने के बाद क्यूनोल्फोस 25 EC 300 मिली या एमामेक्टीन बेंजोइट 5 SG 200 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी के हिसाब से spray कर दे|

चूर्णिल आसिता या छाछिया रोग (Powdery mildew)

इसके प्रकोप से फसल पर सफेद धब्बे बन जाते है| रोग की रोकथाम के लिए टेबुकोनाजोल 10%+ सल्फर 65% WG 400 ग्राम या 500 ग्राम घुलनशील सल्फर या थिओफिनेट मिथाइल 75 WP 300 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव कर सकते है| अर्का अजीत भी पाउडरी मिल्ड्यू के प्रति रोगरोधी किस्म है, अतः इसे लगाए|

उकठा रोग (Wilt Disease) 

इस रोग का प्रकोप फसल की किसी भी अवस्था में हो सकता है| रोग की शुरुआत, खेत में छोटे छोटे टुकड़ों से होती है उसके बाद रोग आगे चलकर पूरे खेत को अपनी चपेट में ले लेता है| 

रोग से बचाव के लिए गर्मी में खेत की गहरी जुताई करे ताकि हानिकारक रोगाणुओं को नष्ट किया जा सके| बुवाई से पहले एक किलो जैविक फफूंदनाशी ट्राइकोडर्मा विरिड को एक एकड़ खेत में 100 किलो गोबर की खाद में मिलाने के बाद उसे फिर खेत में मिला दे और तुरन्त बाद हल्की सिंचाई जरूर करे|

आपका कोई भी सुझाव या जानकारी सहृदय आमंत्रित है| कमेन्ट करके जरूर बताए....धन्यवाद

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Hi, This is Hemant Verma from Jodhpur, Rajasthan & M.Sc Agriculture From AAU Anand Gujarat. I am here for bring prosperity in Farming Community So Welcome to Agriculture Professional. Our Services are- Providing Agriculture Knowledge, Updating Agriculture News and Finding Solutions on agriculture related problems.

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